Tuesday, August 4, 2015

याकूब मामला

शेख करता तो है

मस्ज़िद में

खुदा को सज़दे

उसके सजदों में असर हो

ये ज़रूरी तो नहीं ........

30 जुलाई 2015

ये तारीख हिंदुस्तान की तवारीख (इतिहास) में लिखी जायेगी

ये वो दिन था जिसने पूरी तरह ध्रुवीकरण कर दिया भारत का

एक तरह वो लोग जो 22 साल तक चले मुक़दमे के आधार पर मिली एक अपराधी को फांसी की सजा के पक्षधर थे

दूसरी तरफ वो लोग जो इतने के बावजूद एक अपराधी को निरपराध मुस्लिम के रूप में पेश करने पर आमादा

मोदी और बीजेपी के विरोध के चलते इतना गिर जायेंगे लोग सोचा ना था

एक साज़िश जिसने 257 मासूम लोगों को मौत के घाट उतार दिया,जिसमे हिन्दू और मुस्लिम दोनों थे ,

इन सेक्युलर लोगों में से किसी एक ने भी इन 22 सालों में इनमे से किसी एक भी परिवार की सुध लेने की कोशिश की क्या?

सुप्रीम कोर्ट के क़ाबिल वकील को
2007 से सुध क्यों नहीं आई जब फांसी की सजा दे दी गई थी ?

कॉंग्रेस के शासन में विस्फोट हुए,कोंग्रेस के शासन में जांच और याकूब की गिरफ़्तारी हुई,कॉंग्रेस के शासन में फांसी की सजा हुई,कॉंग्रेस के शासन में दया याचिका विलंबित रही

तब क्या सब सो रहे थे ?

रॉ के अफसर जो आज सरेंडर बता रहे हैं  क्या मुक़दमा चलने तक उनको मौका नहीं मिला था अपनी बात रखने का ?

सुविचारित ढंग से एक अपराधी को शहीद घोषित करने की साज़िश का सूत्र धार आखिर है कौन ?

किसका पैसा खर्च हुआ इतने लंबे मुक़दमे में और इस प्रायोजित केम्पेन में ?

जिसमें वकील,मुख्य धारा प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,राजनेता तक शामिल हैं

सरकार को इन सभी लोगों के बैंक एकाउंट्स ,कॉल रेकॉर्ड्स और इनकम टैक्स रिटर्न की जांच करवाएं

आखिर इस अभियान की फंडिंग कहाँ से और कहाँ तक हुई

दूसरी तरफ एक भारत माँ का लाल चिर निद्रा में धरती की गोद में सो गया

इनमें से किसी को उसके लिए प्रार्थना करने की सुध नहीं आई

क्योंकि मुस्लिम होते हुए भी वो राष्ट्र के प्रति समर्पित ज्यादा था

एक सच्चा भारतीय डॉ कलाम

एक तरफ भारत का नाम ऊँचा करने वाला सपूत

दूसरी तरफ अपने ही देश की धरती खून से लाल करने वाला अपराधी

और जनाज़े में भीड़ दूसरे की ज्यादा थी

वक़्त है सँभालने का

संभलने का

आने वाले वक़्त में इस से बदतर चुनौतियाँ आने वाली हैं

पर विश्वास है इन सब से उबर कर बनेगा और रहेगा हमेशा

"मेरा भारत महान " 

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